जींद , 23 जुलाई
जहाँ चाह, वहाँ राह”-इस कहावत को चरितार्थ को जींद शहर की होनहार बेटी आरजू ने कर दिखाया है।शहर की गलियों में सब्जी बेचने वाले एक साधारण पिता की बेटी ने अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर नीट परीक्षा में ऑल इंडिया 6,227वीं रैंक हासिल कर पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है। 12वीं कक्षा में पढ़ते हुए ही पहले प्रयास में मिली इस शानदार सफलता से न केवल परिवार में जश्न का माहौल है, बल्कि पूरा शहर बेटी की इस उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहा है।
आरज़ू की सफलता के पीछे एक भावुक और प्रेरणादायक कहानी है। जब वह छठी कक्षा में थीं, तब उनके दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। उचित स्वास्थ्य सुविधा और सही डायग्नोसिस न मिल पाने के कारण उनका निधन हो गया। इस दुखद घटना ने नन्हीं आरज़ू के मन में गहरा प्रभाव छोड़ा और उन्होंने उसी दिन ठान लिया कि वह बड़ी होकर एक सफल और संवेदनशील डॉक्टर बनेंगी ताकि किसी और को इलाज के अभाव में अपना परिजन न खोना पड़े।
आर्थिक तंगी के बावजूद पिता नरेंद्र कुमार और माता पूनम ने बेटी के सपने को कभी टूटने नहीं दिया। सब्जी बेचकर परिवार का गुजर-बसर करने वाले पिता के सामने कोचिंग की भारी-भरकम फीस एक बड़ी चुनौती थी। माता पूनम ने भावुक होते हुए बताया कि एक समय ऐसा था जब बजट के कारण कोचिंग दिलाना असंभव लग रहा था, लेकिन पति ने हिम्मत नहीं हारी और स्पष्ट कहा, “चाहे मुझे खून ही क्यों न बेचना पड़े, मैं बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दूंगा।
पिता की इसी अटूट निष्ठा और मेहनत को आरज़ू ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और रोजाना 7 से 8 घंटे की अनुशासित पढ़ाई से इस मुकाम को हासिल किया। 6वी क्लास से ही डॉक्टर बनने का सपना मन में संजोया। प्रतिदिन 7-8 घंटे गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई की। फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स से दूरी बनाई, जबकि ए आई तकनीक और अध्ययन सामग्री का सही उपयोग किया।परीक्षा रद्द होने पर 600+ अंक का हौसला डिगा नहीं, बल्कि दोबारा दोगुनी लगन से तैयारी कर बेहतर रैंक पाई।
डी.ए.वी. सेंचुरी पब्लिक स्कूल, जींद से 12वीं की शिक्षा तथा आकाश इंस्टीट्यूट से कोचिंग प्राप्त की आरजू ने बताया कि मैं एक ऐसी सफल और संवेदनशील डॉक्टर बनना चाहती हूँ जो गरीब और असहाय लोगों की नि:स्वार्थ सेवा कर सके। मैं खुद जिस पृष्ठभूमि से आई हूँ, वहाँ से डॉक्टर बनना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए मेरा मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि लोगों की जान बचाना होगा।
पिता नरेंद्र कुमार ने बताया कि बेटी शुरू से ही कुशाग्र बुद्धि की थी। हमने बस उसे सही मार्गदर्शन दिया, बाकी सब उसकी दिन-रात की मेहनत का फल है। सब्जी बेचकर जो तंगी उठाई थी, आज बेटी ने उसे सार्थक कर हमारा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है।”
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