रिश्ता खत्म करना है तो सीधे कत्ल ही क्यों? आखिर क्यों आज की पीढ़ी चुन रही है खौफनाक रास्ता!

Sonam Malhotra “यदि रिश्ता नहीं रखना, तो सीधा कत्ल ही क्यों? आज की युवा पीढ़ी आख़िर क्यों बातचीत के सारे रास्ते बंद कर हत्या जैसे…

"यदि रिश्ता नहीं रखना, तो सीधा कत्ल ही क्यों? आज की युवा पीढ़ी आख़िर क्यों बातचीत के सारे रास्ते बंद कर हत्या जैसे खौफनाक कदम चुन रही है?
Sonam Malhotra

“यदि रिश्ता नहीं रखना, तो सीधा कत्ल ही क्यों? आज की युवा पीढ़ी आख़िर क्यों बातचीत के सारे रास्ते बंद कर हत्या जैसे खौफनाक कदम चुन रही है? क्यों किसी रिश्ते को सम्मानजनक और सीधे तरीके से खत्म नहीं किया जा रहा?” ऐसे कई अनसुलझे सवाल आज हमारे समाज के सामने मुंह बाए खड़े हैं, जिनका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

आज की पीढ़ी यदि किसी रिश्ते से बाहर निकलना चाहती है—चाहे वह Relationship हो या फिर शादी—तो वे सीधे अपराध का रास्ता अपना रहे हैं। आए दिन ऐसी दिल दहला देने वाली खबरें सामने आती हैं कि कहीं लड़की ने लड़के की जान ले ली, तो कहीं लड़के ने लड़की को मौत के घाट उतार दिया। हर रोज किसी न किसी घर का चिराग बुझ रहा है। ऐसा खौफनाक कदम उठाने से पहले लोग यह भी नहीं सोचते कि उनके इस फैसले का उनके माता-पिता या परिवार पर क्या असर पड़ेगा। लोगों को न जाने क्यों ऐसा लगने लगा है कि किसी को मारकर ही रिश्ते से पीछा छुड़ाया जा सकता है, जबकि आपसी बातचीत, ब्रेकअप या कानूनी रूप से तलाक लेकर भी अलग हुआ जा सकता है।

माता-पिता की मर्जी और ‘ना’ न कह पाने का सामाजिक दबाव

भारत में रिश्तों को बहुत अहमियत दी जाती है। जहाँ एक तरफ कुछ लोग रिश्ते निभाने के लिए अपनी जान लगा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इनसे छुटकारा पाने के लिए सही रास्ता चुनने के बजाय बेहद भयानक रास्ता अपनाते हैं। आज की पीढ़ी अक्सर माता-पिता के सामने ‘ना’ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। जब पेरेंट्स अपनी मर्जी से बच्चों का रिश्ता तय करते हैं, तो बच्चे उन्हें निराश न करने के डर से सीधे मना नहीं कर पाते। लेकिन बाद में उसी थोपे गए रिश्ते से मुक्ति पाने के लिए वे उस शख्स को ही रास्ते से हटा देते हैं। यदि माता-पिता भी बच्चों की पसंद-नापसंद को समझे बिना उन पर जबरदस्ती शादी का दबाव बनाते हैं, तो इसके परिणाम बेहद घातक साबित होते हैं।

जानिए सोशल मीडिया की क्या भूमिका है?

आज की पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में एक बड़ा अंतर आपसी संवाद (Communication) का है। पहले लोग परिवार के साथ बैठकर समय बिताते थे और अपनी परेशानियां साझा करते थे। वहीं आज की नई पीढ़ी परिवार के साथ कम और स्मार्टफोन या सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताती है।

इसके अलावा, हमारे समाज में आज भी जातिवाद एक बहुत बड़ी समस्या है, जिसके कारण लड़कियों को उनकी पसंद के लड़के से शादी नहीं करने दी जाती। भारत में आज भी ‘तलाक’ (Divorce) को एक सामाजिक कलंक या बहुत गलत माना जाता है। समाज शादी को इस नजरिए से देखता है कि चाहे दोनों खुश हों या न हों, लेकिन यह रिश्ता पूरी जिंदगी चलना चाहिए। यही सामाजिक रूढ़िवादिता और बदनामी का डर युवाओं को बातचीत के जरिए अलग होने से रोकता है और वे खौफनाक कदम उठा बैठते हैं। लेकिन क्या अपनी झूठी शान और इज्जत बचाने के चक्कर में पूरे परिवार को बर्बादी के दलदल में धकेल देना समझदारी है?

मुस्कान, सोनम रघुवंशी और सिया: वो मामले जिन्होंने देश को झकझोर कर रख दिया

हाल ही में भारत में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने समाज को अंदर तक हिलाकर रख दिया है। देश में आगे कोई और मुस्कान, सोनम या सिया न बने, इसके लिए हम सबको अभी से सचेत होना पड़ेगा:

मुस्कान रस्तोगी मामला: मुस्कान का पति मर्चेंट नेवी में अच्छे पद पर कार्यरत था। इसके बावजूद मुस्कान ने अपने बेरोजगार बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर अपने ही पति को मौत के घाट उतार दिया।

सोनम रघुवंशी कांड: सोनम रघुवंशी ने अपने पति राजा रघुवंशी की उनके हनीमून के दौरान ही बेरहमी से हत्या कर दी। इस हत्याकांड के पीछे भी उसका बॉयफ्रेंड ही वजह था।

पुणे का सिया-केतन मामला: पुणे में रहने वाली सिया ने अपने मंगेतर केतन को, जो उससे बेहद प्यार करता था, उसके जन्मदिन से ठीक पहले लोहागढ़ किले से धक्का देकर मार डाला। दोनों की 17 करोड़ रुपये की भव्य शादी तय हुई थी और केतन ने सिया के बर्थडे महीने को खास बनाने के लिए एक सरप्राइज प्लान किया था। लेकिन सिया ने अपने बॉयफ्रेंड चेतन के साथ मिलकर केतन की जान ले ली।

सोशल मीडिया का दिखावा और मानसिकता पर असर

आजकल सोशल मीडिया पर दिखावे (Flexing) का चलन बहुत बढ़ गया है। लोग खुद को खुश दिखाने के लिए तरह-तरह की तस्वीरें और पोस्ट डालते हैं, जिन्हें देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि वे अपनी निजी जिंदगी या रिश्तों से कितने परेशान हैं। सोशल मीडिया पर तरह-तरह का नकारात्मक कंटेंट देखकर लोगों की मानसिकता विकृत होती जा रही है।

सोशल मीडिया का असली मकसद ज्ञान बढ़ाना और तरक्की करना है, न कि अपराध के तरीके सीखना। अगर इसका सही इस्तेमाल किया जाए तो यह कमाई और करियर का बेहतरीन साधन है, लेकिन गलत इस्तेमाल पूरी जिंदगी को सलाखों के पीछे बर्बाद कर सकता है।

समय रहते सोच बदलने की ज़रूरत

समाज को समय रहते अपनी इस रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा। माता-पिता और बच्चों को आपस में बैठकर रिश्तों पर खुलकर और गहराई से बात करनी चाहिए।

पेरेंट्स को अपने बच्चों की पसंद-नापसंद का सम्मान करना चाहिए और उन पर जबरन शादी का दबाव नहीं बनाना चाहिए।

शादीशुदा जोड़ों से भी परिवार को बीच-बीच में बातचीत कर पूछते रहना चाहिए कि उनके जीवन में सब ठीक चल रहा है या नहीं।

पति-पत्नी या पार्टनर को अपने आपसी झगड़े मिलकर, काउंसलिंग के जरिए या बातचीत से सुलझाने चाहिए।

अगर लोग फोन की आभासी दुनिया को छोड़कर, बदनामी के झूठे डर को भुलाकर आपसी बातचीत को मौका दें या खुश न होने पर सम्मानपूर्वक तलाक ले लें, तो समाज में बहुत कुछ सुधर सकता है। रिश्ता कोई बोझ नहीं है जिसका भार घिसटते हुए पूरी उम्र उठाना पड़े। आज की पीढ़ी पढ़ी-लिखी है, उसे सूझबूझ और ठंडे दिमाग से कदम उठाना चाहिए ताकि किसी भी हंसते-खेलते परिवार को तबाह होने से बचाया जा सके।

 

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