Aravalli Hills Dispute: अरावली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञानः कल होगी सुनवाई, जानिए क्या है मामला जिसको लेकर हो रहे प्रदर्शन?

SC suo motu on Aravalli Hills Dispute: अरावली पहाड़ी को बचाने के लिए चले आंदोलनों के बीच (Aravalli Hills Dispute) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने…

SC suo motu on Aravalli Hills Dispute:

अरावली पहाड़ी को बचाने के लिए चले आंदोलनों के बीच (Aravalli Hills Dispute) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी दखल दी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सोमवार को सुनवाई करने की बात कही है. इस मामले की सुनवाई तीन जजों की बेंच करेगी. इस बेंच में CJI सूर्यकांत , जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस एजी मसीह शामिल होंगे. इस मामले को ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा और संबंधित मुद्दे ‘ का शीर्षक दिया गया है.

अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को खतरा-

विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिभाषा के बाद अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को हटाया जा सकता है. केंद्र सरकार ने अरावली पर्वतमाला के वैज्ञानिक महत्व को जाने बिना, सार्वजनिक सलाह लिए बिना नई परिभाषा तय की है, जिससे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले अरावली के बड़े हिस्से खनन के खतरे में पड़ सकते हैं. यह पर्वतमाला दिल्ली और इससे सटे नोएडा को राजस्थान के रेगिस्तान की धूल-मिट्टी से बचाती है, लेकिन इसे ध्यान में रखे बिना फैसला किया गया.

विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला का एरिया कम होने से अवैध खनन बढ़ेगा. रेगिस्तान का विस्तार और ज्यादा होगा. भूजल स्तर गिरने से पानी की कमी होगी. रेगिस्तान की धूल-मिट्टी दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा को भी प्रदूषित करेगी. जैव विविधता का विनाश होगा और गर्मी बढ़ेगी.

Aravalli Hills Dispute क्या है FSI की परिभाषा-

भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की परिभाषा के अनुसार, अरावली की निचली पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे में आती हैं, जिन्हें मंत्रालय के 100 मीटर के मापदंड से बाहर कर दिया गया है. एफएसआई ने राजस्थान के 15 जिलों में फैले लगभग 40491 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को तीन डिग्री ढलान वाली निचली अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना है.

सुप्रीम कोर्ट 2010 में फॉर्मूले को कर खारिज-

इस निर्णय को लेकर विवाद इसलिए भी गहरा गया है क्योंकि जिस उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ पैनल का हवाला सरकार ने दिया उसी पैनल ने पहले इस 100 मीटर की परिभाषा का विरोध किया था. यह पैनल सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 में वन संरक्षण से जुड़े सुझाव देने के लिए गठित किया था. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2010 में भी इस तरह के 100 मीटर के फॉर्मूले को खारिज कर चुका है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिभाषा लागू होने से अरावली हिल्स का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है जिससे खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और राजस्थान तथा गुजरात को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह नकार दिया है.

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