Kedarnath dham Yatra 2025: केदारनाथ पैदल मार्ग पर दो दिन में 14 घोड़े-खच्चर की मौत, 24 घंटे के लिए आवाजाही पर लगी रोक

Kedarnath dham Yatra 2025: उत्तराखंड में चारों धामों (Chardham Yatra Registration) के कपाट खुल चुके हैं. हर रोज हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंच रहे हैं.इस…

Kedarnath dham Yatra 2025: उत्तराखंड में चारों धामों (Chardham Yatra Registration) के कपाट खुल चुके हैं. हर रोज हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंच रहे हैं.इस बीच केदारनाथ धाम में घोड़े-खच्चरों में संक्रमण ने प्रशासन और श्रद्धालुओं की परेशानी बढ़ा दी है.

दरअसल, पिछले दो दिनों में 14 जानवरों की मौत हुई है. मौत का कारण एक्वाइन इन्फ्लूएंजा वायरस माना जा रहा है. जानवरों की मौत के बाद प्रशासन ने घोड़े-खच्चरों पर 24 घंटे के लिए रोक लगाई है. मौत के असल कारणों का पता लगाने के लिए केंद्र से टीम रुद्रप्रयाग पहुंच रही है.

(14 horses and mules died in two days on the Kedarnath walking route news in hindi)

केदारनाथ पैदल मार्ग पर दो दिन में 14 घोड़े-खच्चरों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद इनके आवागमन पर 24 घंटे के लिए रोक लगा दी गई है. एक अधिकारी ने मंगलवार को यह जानकारी दी. घोड़ों-खच्चरों की मौत की सूचना मिलने के बाद सोमवार रात रुद्रप्रयाग पहुंचे पशुपालन सचिव डॉ. बीवीआरसीसी पुरुषोत्तम ने जिला प्रशासन के साथ स्थिति की समीक्षा की. उन्होंने बताया कि फिलहाल यात्रा के लिए घोड़ों-खच्चरों का संचालन 24 घंटे के लिए रोक दिया गया है.

इस संबंध में पुरुषोत्तम ने बताया कि रविवार को आठ घोड़े-खच्चरों की मौत हुई और सोमवार को छह घोड़े-खच्चरों की मौत हुई. उन्होंने बताया कि मौत का कारण ‘इक्वाइन इन्फ्लूएंजा’ नहीं लगता है और प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि मौत किसी जीवाणु संक्रमण के कारण हुई है.

उन्होंने बताया कि रिपोर्ट में संक्रमण की पुष्टि नहीं होने पर ही यात्रा जारी रखने की अनुमति दी जाएगी. पुरुषोत्तम ने बताया कि एक माह पहले 4 अप्रैल को घोड़ों में ‘इक्वाइन इन्फ्लूएंजा’ के लक्षण पाए गए थे, जिसके बाद 30 अप्रैल तक 26 दिनों में रिकॉर्ड 16 हजार घोड़ों की जांच की गई.

उन्होंने बताया कि इनमें से 152 घोड़ों और खच्चरों के नमूनों में संक्रमण की पुष्टि हुई थी लेकिन उनकी आरटीपीसीआर जांच में इसकी पुष्टि नहीं हुई. 11,500 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम तक पहुंचने के लिए करीब 16 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है. हालांकि, कुछ तीर्थयात्रियों को इस चढ़ाई वाले रास्ते को पार करने के लिए पालकी, घोड़े और खच्चरों का सहारा लेना पड़ता है.

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