Varanasi: मृत्यु के बाद भी कई लोगों को सम्मानजनक अंतिम यात्रा नहीं मिल पाती, लेकिन आज हम एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताएंगे जो लावारिस मृतकों की अंतिम यात्रा को सम्मानजनक बनाने का काम करता है, जिसे ‘मुर्दों का मसीहा’ कहा जा सकता है. काशी जैसे पवित्र शहर में भी कई लावारिस लोगों को सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं मिल पाता.
काशी में लावारिस शवों को सम्मानजनक अंतिम संस्कार दिलाने का काम करने वाले नित्यानंद तिवारी पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और उनके दोनों बेटे भी इसी पेशे में हैं. वे अपनी आय का एक हिस्सा लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए देते हैं और अपने पिता की इस सेवा में हाथ बंटाते हैं. नित्यानंद तीन लोगों की टीम के साथ काम करते हैं और उन्होंने अपनी मां की मृत्यु के बाद लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने का संकल्प लिया था.
नित्यानंद तिवारी कहते हैं कि वे अपने पिता की इच्छा पूरी कर रहे हैं, जिनकी चाहत थी कि वे लावारिस लोगों को मोक्ष प्रदान करें. नित्यानंद अपने पिता को जीवित मानते हुए कहते हैं कि जैसे वे अपने पिता का इलाज करवाते, उसी तरह हर दिन के इलाज के खर्च के बराबर पैसे लावारिस शवों के अंतिम संस्कार में लगाते हैं. जब शवों की संख्या अधिक होती है, तो वे समझते हैं कि आज उनके पिता का कोई बड़ा टेस्ट हुआ है, जिससे उन्हें अपने पिता के साथ होने का एहसास होता है.
नित्यानंद तिवारी अब तक 66,000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. वे प्रति शव 1150 रुपये खर्च करते हैं और इस काम में डोम चौधरी परिवार भी उनका साथ देता है. शुरुआत में डोम राजा महेंद्र चौधरी ने पैसे लेने से इनकार कर दिया था, लेकिन नित्यानंद ने उन्हें 1100 रुपये दक्षिणा के रूप में दिए थे.
अब तक इस काम में लगभग 6 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं. नित्यानंद की तीन लोगों की टीम इस काम में जुटी है, जिसमें हरिश्चंद्र घाट पर चौधरी परिवार के लोग भी शामिल हैं.
खबरो के लिए जुड़े रहिए Living India News के साथ 24/7 live’



