जलयुद्ध यानि सियासत की नहर एसवाईएल में जल के लिए इनेलो की जंग। एसवाईएल नहर के इतिहास में ऐसे तो कई दिन जुड़े हैं लेकिन 10 जुलाई का दिन भी याद किया जाएगा क्योंकि इस जलयुद्ध को गांधीगिरी से लड़ा गया। पंजाब हरियाणा के पांच बॉर्डर पर इनेलो ने पंजाब की नो एंट्री लगा दी। जो आए उन्हें सरकार के नाम संदेश के साथ गुलाब का फूल देकर लौटा दिया गया ।
एसवाईएल की सियासत ने दो प्रदेशों के भाईचारे में खटास पैदा कर दी। पंजाब से आने वाले रास्ते, रिश्तों सभी पर 6 घंटों के लिए नो एंट्री लगा दी गई। जो भी रास्ते पंजाब से हरियाणा को जाता है सभी को बंद कर दिया गया। सीमा को छावनी में तब्दील कर दिया गया, ऐसा माहौल बना मानो इनेलो एसवाईएल से पानी लाने नहीं बल्कि कुरुक्षेत्र के रण में युद्ध करने गई हों, लेकिन वहां चल रही थी गांधीगिरी। अंबाला में दो जगहों पर प्रदर्शन चल रहा था सद्दोपुर, और शंभू बार्डर, खनौरी बार्डर पर भी इनेलो कार्यकर्ता डटे थे फतेहाबाद और जींद को जाने वाली रास्तों पर भी वाहनों को रोका गया। और इन सभी जगहों पर हवाई यात्रा कर अभय चौटाला पहुंचे।
शंभू बार्डर पर अभय चौटाला के अलावा पार्टी के कई बड़े नेता मौजूद थे खुद सांसद दुष्यंत चौटाला कमान संभाले हुए थे प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा भी पहुंचे थे साथ ही रामपाल माजरा समेत सैकड़ों कार्यकर्ता सड़क पर बैठकर पंजाब से एसवाईएल का हक मांग रहे थे।
पुलिस प्रशासन ने इस आंदोलन से लोगों को होनेवाली परेशानी के चलते कई जगहों से रूट भी डायवर्ट किया ताकि लोग वैकल्पिक रास्तों का उपयोग कर अपनी मंजिल तक पहुंच सके। फतेहाबाद में भी इनेलो ने सुबह 9 बजे डेरा डाल दिया हरियाणा पंजाब सीमा पर बसे गांव ब्राह्मणवाला में गाड़ियों को रोका गया। जींद में भी इनेलो के प्रदर्शन का असर दिखा डिपो से जाने वाली सभी रोडवेज की बसों को बंद रखा गया। गांव दाता सिंहवाला बॉर्डर पर इनेलो कार्यकर्ताओं ने गाड़ियों को पंजाब से हरियाणा में एंट्री नहीं करने दी।
हालांकि इस प्रदर्शन का मुख्य केंद्र अंबाला ही रहा वो भी कई मायनो में, सबसे पहला, दो जगहों पर प्रदर्शन था। दूसरा, सभी बड़े नेता यहां कमान संभाले हुए थे और तीसरा जनभागीदारी भी ज्यादा थी खासकर महिलाएं इनेलो के इस जलयुद्ध में कंधा से कंधा मिलाकर साथ दे रही थी।
ये नहर सियासत की है। इसमें सिर्फ राजनीति की धाराएं बहती है। कभी कभी तूफान भी आता है लेकिन वो भी सिर्फ सियासत की उंचाईयों को छूकर शांत हो जाता है। इस बार भी तूफान इनेलो ने उठाया पंजाब के रास्ते बंद किए। लेकिन विरोधी दलों के निशाने पर आ गए।
हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने सरकार के दौरान 10 सालों में पानी लाने के लिए कोई खास कदम तो नहीं उठाया लेकिन इनेलो को एसवाईएल विवाद का जड़ बताया। दीगर बात है कि इस नहर की नींव उन्ही पार्टी ने पंजाब में रखी थी।
हरियाणा कांग्रेस का कोई भी नेता हो इनेलो के इस प्रदर्शन को सिर्फ राजनीति बता रहे हैं और बीजेपी से मिले होने की बात कहना कोई नई नहीं है।सीएलपी लीडर किरण चौधरी का कहना था कि इनेलो तो राजनीति कर ही रही है लेकिन केंद्र एसवाईएल का हक ना देकर हरियाणा की जनता के साथ जुल्म कर रही है
बात पंजाब की करें तो यहां भी इनेलो के इस प्रदर्शन पर राजनीति जारी है। लेकिन यहां एक बात जरूर है कि सभी पार्टियां इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई दे रही है चाहे वो धार्मिक संस्था एसजीपीसी ही क्यों ना हो। एसजीपीसी के प्रधान किरपाल सिंह बडूंगर का कहना है कि इनेलो अंधेर में तीर चला रही है।
क्या इस आंदोलन से सियासत की नहर एसवाईएल में पानी आएगा? सवाल ये अहम जरूर है लेकिन इनेलो का मानना है कि इस आंदोलन ने सोई हुई सरकारों को जगाने का काम जरूर किया है। अब सवाल ये भी अहम है कि राजनीति की नहर में दो प्रदेशों का भाईचारा कहीं खराब तो नहीं हो रहा, खैर, इनेलो की इस जंग से नहर में पानी तो फिलहाल नहीं आया लेकिन पानी लाने के लिए इनेलो नेताओं को एनर्जी ड्रिंक तक पीना पड़ा।
जाहिर है राजनीति की इस नहर में दशकों से पानी नहीं आया। कई बार आंदोलन हुए मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। यहां तक की इसकी खुदाई भी अभी तक पूरी नहीं हुई। अब इसे आप भी दोनों प्रदेशों की राजनीति की लाइफलाइन मान ही लीजिए।









