Punjab Kesari Group Scam: पंजाब केसरी ग्रुप ने तीन साल किया 65 करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला, पंजाब के टैक्स विभाग ने जीएसटी और सर्कुलेशन घोटाले का किया खुलासा

Punjab Kesari Group Scam: चंडीगढ़, 02 मार्च 2026: पंजाब केसरी ग्रुप में बीते तीन वर्षों में 65 करोड़ रुपए से ज्यादा के लेन-देन से जुड़ा…

Punjab Kesari Group Scam: पंजाब केसरी ग्रुप ने तीन साल किया 65 करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला, पंजाब के टैक्स विभाग ने जीएसटी और सर्कुलेशन घोटाले का किया खुलासा

Punjab Kesari Group Scam:

चंडीगढ़, 02 मार्च 2026:

पंजाब केसरी ग्रुप में बीते तीन वर्षों में 65 करोड़ रुपए से ज्यादा के लेन-देन से जुड़ा एक बड़ा कर घोटाला उजागर होने से मीडिया जगत में हलचल मच गई है। यह मामला द हिंद समाचार लिमिटेड से संबंधित है, जो पंजाब केसरी ग्रुप की एक प्रमुख इकाई है। पूरे प्रकरण का खुलासा पंजाब के टैक्स विभाग की विस्तृत जांच के बाद हुआ है। पंजाब वस्तु एवं सेवा कर कानून के तहत कर निर्धारण और जुर्माने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी गई है।

5 फरवरी 2026 को जालंधर के सिविल लाइंस स्थित मुख्य कार्यालय पर जांच की गई। इसके साथ ही लुधियाना और बठिंडा की इकाइयों में भी एक साथ कार्रवाई की गई। यह पूरी कार्रवाई कर विवरणियों की गहन पड़ताल, माल ढुलाई से जुड़े प्रपत्रों की जांच और टोल प्लाजा के रिकॉर्ड के मिलान के आधार पर की गई।

16,807 मीट्रिक टन अखबारी कागज का दावा, लेकिन परिवहन का कोई ठोस प्रमाण नहीं-

जांच में सामने आया कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कंपनी ने लगभग 16,807 मीट्रिक टन अखबारी कागज की खरीद और आपूर्ति दिखाई। इसमें 10,247 मीट्रिक टन सीधी खरीद और 6,560 मीट्रिक टन अपनी ही दूसरी इकाइयों को भेजा गया माल शामिल है। इन लेन-देन का कुल मूल्य लगभग ₹65.61 करोड़ बताया गया है।

यह मात्रा 21 करोड़ से ज्यादा अखबारों की छपाई के बराबर बताई गई है, 13 करोड़ प्रतियां सीधी खरीद से और 8 करोड़ प्रतियां अन्य इकाइयों को भेजे गए कागज से संबंधित दर्शाई गई हैं।

लेकिन जब माल ढुलाई के प्रपत्रों को वाहन संचालन के रिकॉर्ड और टोल प्लाजा के आंकड़ों से मिलाया गया, तो स्थिति चौंकाने वाली निकली। जांचे गए 407 प्रपत्रों में से 219 में “कोई आवाजाही नहीं” दर्ज पाई गई। कई मामलों में जिन वाहनों का उल्लेख था, वे जालंधर की ओर जाते ही नहीं दिखे। वे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में दर्ज पाए गए।

457 बाहर भेजे गए माल के प्रपत्रों के मामले में भी टोल रिकॉर्ड से यह साबित नहीं हो सका कि माल वास्तव में अपने गंतव्य तक पहुंचा। जांच के दौरान माल रसीद, भाड़े का रिकॉर्ड और सामान प्राप्ति की पावती भी प्रस्तुत नहीं की गई।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि कागजों में दर्ज लेन-देन और जमीन पर वास्तविक गतिविधि में गंभीर अंतर है। सवाल उठता है कि क्या करोड़ों का यह लेन-देन केवल दस्तावेजों तक सीमित था?

रद्द और संदिग्ध पंजीकरण वाले सप्लायरों से खरीद-

जांच में यह भी सामने आया कि जिन सप्लायरों से खरीद दिखाई गई, उनमें से कई का कर पंजीकरण पहले ही रद्द या निलंबित किया जा चुका था या वे संदिग्ध पाए गए। पूरी आपूर्ति श्रृंखला में आपस में जुड़ी कंपनियों का एक सीमित नेटवर्क सामने आया, जिसका किसी बड़े और विश्वसनीय निर्माता या आयातक से सीधा संबंध नहीं मिला। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि खरीद और आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा केवल कागजी व्यवस्था के सहारे चलाया गया।

विज्ञापन एजेंसियां भी घेरे में

इस मामले में 10 विज्ञापन एजेंसियों की भी जांच की गई। लुधियाना की एक एजेंसी ने जांच के दौरान ₹16.35 लाख स्वेच्छा से जमा कर दिए। यह जमा राशि इस बात का संकेत मानी जा रही है कि जांच का दायरा केवल एक इकाई तक सीमित नहीं है। बाकी एजेंसियों के मामलों में जांच जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कागज नहीं आया तो अखबार छपे कैसे? अगर इतनी बड़ी मात्रा में अखबारी कागज वास्तव में नहीं पहुंचा, तो घोषित संख्या में अखबारों की छपाई कैसे हुई?

घोषित खरीद 13 करोड़ अखबारों की छपाई के बराबर है और 8 करोड़ प्रतियों के बराबर कागज अन्य राज्यों में भेजा गया बताया गया है। लेकिन जांच के दौरान स्टॉक का पूरा हिसाब, कागज की खपत का स्पष्ट रिकॉर्ड और माल की आवाजाही का रजिस्टर पेश नहीं किया गया। यह सवाल अब सीधे तौर पर कंपनी के दावों की विश्वसनीयता पर खड़ा है।

मामला सिर्फ कर चोरी तक सीमित नहीं

जब अखबारों की प्रसार संख्या के आधार पर विज्ञापन, विशेषकर सरकारी विज्ञापन दिए जाते हैं, तब उत्पादन और वास्तविक स्थिति में अंतर सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

संदिग्ध खरीद, कर में अनुचित लाभ और बिना ठोस प्रमाण के दिखाई गई आपूर्ति को एक साथ देखें तो पिछले तीन वर्षों में ₹65 करोड़ से ज्यादा का लेन-देन जांच के घेरे में है।

यह कोई साधारण चूक नहीं है। यह कोई मामूली लेखा त्रुटि नहीं है। यह एक सुनियोजित और व्यवस्थित ढांचे की ओर संकेत करता है, जिसमें कागजों पर बड़े पैमाने पर लेन-देन दिखाए गए, लेकिन जमीन पर उनके ठोस प्रमाण सामने नहीं आए।

राज्य सरकार ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी संस्था, चाहे उसका प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। मीडिया संस्थान भी आर्थिक जवाबदेही से बाहर नहीं हैं। प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ कर नियमों से छूट नहीं है।

कानून के तहत आगे खातों का मिलान किया जा रहा है, संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और वित्तीय लेन-देन की गहराई से जांच जारी है। साक्ष्यों के आधार पर आगे कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार ने दो टूक कहा है कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। गलत दावों और गलत प्रस्तुतियों को चुनौती दी जाएगी। जवाबदेही तय होगी और आवश्यकता पड़ी तो पूरी वसूली भी की जाएगी।

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