ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया न्यूज: दिल्ली की जनता ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया है। एक बार फिर से कांग्रेस भारत के दिल से उतर गई है। देश की राजधानी की सियासत में कांग्रेस शून्य हो चुकी है। 1993 से जब से दिल्ली में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उसके बाद 27 साल में दूसरी बार कांग्रेस यहां चुनाव में खाता भी नहीं खोल सकी है। यानि की दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को सिरे से ही नकार दिया है।
2013 में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की अंगुली पकड़कर ही दिल्ली की सत्ता में काबिज हुई थी। हालांकि उस वक्त आप-कांग्रेस की सिर्फ 49 दिन ही सरकार चल पाई थी, लेकिन दिल्ली दरबार में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सहारे ही चढ़ना शुरु किया था। दोनों पार्टियों के बीच सियासी विवाद बढ़ा तो फिर से दिल्ली की जनता ने चुनाव में हिस्सा लिया। 2015 के चुनाव में आप ने सहारा बनी कांग्रेस को कड़ी मात दे दी। कांग्रेस का जहां 2015 में सूपड़ा साफ हो गया था, तो वहीं आम आदमी पार्टी ने इतिहास रच दिया। अरविंद केजरीवाल की पार्टी 70 में से 67 सीट जीतकर विधानसभा पहुंची और बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर ही सिमट कर रह गई।
कांग्रेस के वोट बैंक को आप ने समेट लिया
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बयान भी यहां पर राजनीतिक पंडितों की इस बात पर मुहर लगा देते हैं कि, कांग्रेस ने बीजेपी को हराने के लिए शायद अपनी सियासी कुर्बानी दी है। क्योंकि कांग्रेस दिग्गज कह रहे हैं कि, उन्हें तो पहले ही ऐसे ही परिणाम की उम्मीद थी, लेकिन कांग्रेस के ये सभी नेता खुद की कम इस परिणाम में भी बीजेपी की चिंता करते हुए नजर आए हैं।
कुल मिलाकर कांग्रेस खेमे से अगर इस चुनावी परिणाम को देखें तो फिर 5 साल बाद भी कांग्रेस दिल्ली की जनता के बीच अपना विश्वास नहीं बना पाई। 2015 में बिना खाता खोले कांग्रेस का जहां वोट प्रतिशत 09.07 प्रतिशत, तो वहीं अब ये घटकर 5 फीसद के आसपास आकर धड़ाम हुआ है। मुश्किल बीजेपी के लिए भी हैं और कांग्रेस के लिए भी, क्योंकि केजरीवाल के विरोध ने इन दोनों ही पार्टियों को दिल्ली की जनता ने ताज नहीं पहनाया, हालांकि बीजेपी ने 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार अच्छा प्रदर्शन करते हुए 2 के आंकड़े को छू लिया है।



