Chandigarh : बॉलीवुड की ‘बरसात’, ’जानवर’, ’शाकालाका बूम बूम’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके सुनील दर्शन अपनी नई फिल्म ‘एक हसीना थी एक दीवाना था’ के साथ सिनेप्रेमियों के सामने एक बार फिर हाजिर हैं। 30 जून को रिलीज इस फिल्म में शिव दर्शन, नताशा फर्नांडिस और उपेन पटेल जैसे सितारें हैं, जिसके रिलीज से पहले कई दावे किए गए, लेकिन क्या ये फिल्म दावों पर खरी उतरी है? क्या यह फिल्म एक कंप्लीट एंटरटेनमेंट पैकेज है या बेसिर-पैर वाली बॉलीवुड फिल्मों की तर्ज पर भी इसे बस बना दिया गया है?

सुनील, उपेन और नदीम का कमबैक
तो, चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ‘एक हसीना थी एक दीवाना था’ फिल्म की स्टोरी लाइन क्या है और क्या खास है इस फिल्म में, जिसे पढ़ने के बाद आप अपने वीकएंड का प्लान बना सकें। सबसे पहले आपको बताते हैं कि इस फिल्म के जरिए निर्देशक सुनील दर्शन और एक्टर उपेन पटेल बॉलीवुड में कमबैक कर रहे हैं। इसके साथ ही सुनील दर्शन ने फिल्म में संगीतकार नदीम को भी जोड़ा है। फिल्म के लिए ‘ट्यूबलाइट’ भी चैलेंज के रूप में सामने है, क्योंकि सिनेप्रेमियों के लिए अभी भी सलमान खान फर्स्ट च्वाइस बने हुए हैं।

क्या है फिल्म की स्टोरी लाइन?
फिल्म की कहानी नताशा और उसके प्यार के इर्द-गिर्द घूमती है। नताशा अपनी शादी की तैयारियों के लिए अपने माता-पिता के पुराने बंगले में आती है। जहां उसे एक लड़के से प्यार हो जाता है। वो उसके लिए सबकुछ छोड़ने को भी तैयार है। इसी बीच नताशा को पता चलता है कि जिस लड़के के लिए वो इतना कुछ छोड़ रही है, असलियत में वो इंसान नहीं एक भूत है। क्या नताशा उस भूत से पीछा छुड़ा सकेगी? क्या वो भूत नताशा के जीवन में किसी साजिश के तहत आया है? आखिर नताशा का उस भूत से क्या रिश्ता है? फिल्म की स्टोरी इसी प्लॉट पर बेस्ड है और आपको इन सब सवालों का जवाब ढूंढने के लिए सिनेमा हॉल का रूख करना होगा।

फिल्म में निर्देशन, अभिनय और संगीत?
अगर फिल्म में निर्देशन की बात करें तो आपको नाउम्मीदी ही हाथ लगेगी। फिल्म का निर्देशन औसत से भी कम है। जिस कारण फिल्म बोझिल लगने लगती है। हालांकि फिल्म का संगीत ठीक-ठाक बन पड़ा है। फिल्म का गाना ‘हुए बेचैन पहली बार’, ‘हंसते हंसते’ काफी सुरीला है, जिसे युवा खासे पसंद कर रहे हैं। गानों को सुनकर आप 1990 और 2000 दशक के बीच बनने वाली बॉलीवुड फिल्मों को याद करने लगेंगे। जहां तक अभिनय की बात है तो तीनों कलाकारों ने स्टोरी लाइन के मुताबिक ठीक काम किया है। लेकिन यह भी तय है कि निर्देशन और स्टोरी लाइन प्रामिसिंग ना हो तो एक्टिंग की गुंजाइश नहीं बनती है। खैर, अब आप तय करिए कि इस वीकएंड को आप सिनेमाहॉल जाना चाहते हैं या फैमिली के साथ एंज्वाय करते हैं। ऑफ्टर ऑल, च्वाइस आपकी है।

