भिवानी, 14 सितंबर
भिवानी में किसानों ने सरकार की नीतियों और किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। किसानों ने लघु सचिवालय के बाहर प्रदर्शन करते हुए सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। किसानों ने खास तौर पर फसल बीमा प्रीमियम की वापसी, भिवानी को सूखाग्रस्त घोषित करने, फसलों की गिरदावरी और उचित मुआवजा देने की मांग उठाई। साथ ही किसानों ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील, बीज पेटेंट और बिजली बिल को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा।
भिवानी में लघु सचिवालय के बाहर किसान नेताओं आजाद सिंह, प्रदेश अध्यक्ष और राकेश आर्य के नेतृत्व में किसान अपनी विभिन्न मांगों को लेकर यहां एकत्रित हुए। किसानों ने प्रशासन को मांग पत्र सौंपते हुए सरकार से समस्याओं का समाधान करने की मांग की।किसान नेताओं का कहना है कि कई किसानों के खाते से वर्ष 2023 में फसल बीमा के नाम पर प्रीमियम काट लिया गया था, लेकिन करीब दो साल बाद यह राशि वापस उनके खातों में डाली जा रही है। किसानों का सवाल है कि जब समय पर प्रीमियम काटा गया था तो अब दो साल बाद राशि वापस करने का क्या औचित्य है। किसानों ने इस मामले में मुआवजा या प्रीमियम का उचित लाभ देने की मांग की।
वहीं जमूरी किसान सभा के राज्य प्रवक्ता ने भिवानी को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग को प्रमुख मुद्दा बताया। किसान नेताओं के मुताबिक क्षेत्र में सूखे की स्थिति को देखते हुए तत्काल गिरदावरी कराई जाए और प्रभावित किसानों को उचित सरकारी मुआवजा दिया जाए।किसानों ने फसल बीमा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए मांग की कि बीमा कंपनियों की जगह सरकार के स्तर पर किसानों की फसल का बीमा किया जाए।
किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि निजी बीमा कंपनियों की व्यवस्था से किसानों को नुकसान हो रहा है।किसानों ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। किसान नेताओं का कहना है कि इस तरह की डील से देश की खेती और मंडी व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उनका दावा है कि अमेरिका की कृषि उपज भारतीय बाजार में आने से पंजाब और हरियाणा की मंडी व्यवस्था प्रभावित होगी और किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।किसान नेताओं ने सरकार से इस डील को रद्द करने की मांग की है।
इसके अलावा किसानों ने बीजों के पेटेंट और कॉर्पोरेट कंपनियों की बढ़ती भूमिका का भी विरोध किया। किसान नेताओं का कहना है कि यदि बीज उत्पादन और आपूर्ति पर कंपनियों का नियंत्रण बढ़ा तो किसानों की पारंपरिक बीज व्यवस्था प्रभावित होगी।किसानों ने बिजली से जुड़े प्रस्तावित कानून को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि इससे कृषि क्षेत्र में बिजली की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और किसानों की खेती की लागत बढ़ सकती है।
किसान नेताओं ने ऐलान किया कि आने वाले दिनों में इन मुद्दों को लेकर आंदोलन को और तेज किया जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चे के नेतृत्व में देशभर के किसानों को लामबंद करने की बात कही गई है।किसान नेताओं के मुताबिक जालंधर में किसानों का सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में प्रतिनिधि शामिल होकर सरकार की नीतियों के खिलाफ आगे की रणनीति तैयार करेंगे।फिलहाल किसानों ने अपनी मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंप दिया है। किसानों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
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