31 जुलाई : क्रांतिकारी उधम सिंह शहादत दिवस

Chandigarh: क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह को याद करने का दिन आया है। उनको नमन  करने का दिन आया है। 31 जुलाई 1940 को शहीद उधम…

Chandigarh: क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह को याद करने का दिन आया है। उनको नमन  करने का दिन आया है। 31 जुलाई 1940 को शहीद उधम सिंह देश के लिए फांसी पर झूल गए थे। जलियावाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए उधम सिंह ने कई सालों तक इंतजार किया। कई साल बीत गए थे लेकिन अंग्रेजों के प्रति गुस्सा कम नहीं हुआ था। गुस्से की आग लिए उधम सिंह इंग्लैंड तक पहुंच गए और वहीं उन्होंने दुशमन को मार गिराया। उनका बचपन अनाथ आश्रम में ही बीता, कोई अपना था तो वह सिर्फ भाई।

अनाथ आश्रम छोड़ने के बाद शहीद उधम सिंह के क्रांतिकारी जीवन की शुरूआत हुई। वह शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की देशभक्ति से काफी प्रभावित थे। हालांकि उनसे मुलाकात नहीं हुई थी लेकिन उनके किस्से सुनकर शहीद उधम सिंह में जोश भर जाता था। भगत सिंह की तरह उम्र तो ज्यादा नहीं थी लेकिन अंग्रेजों के प्रति गुस्सा बहुत था। पढ़ाई छोड़ने के करीब एक साल बाद ही जलिवाला बाग हत्याकांड हुआ और इस हत्याकांड से उधम सिंह का गुस्सा ज्वाला बन गया। बदले की आग उन्हें टिकने नहीं दे रही थी। यही कारण था कि वह बदला लेने के लिए इंग्लैंड पहुंच गए।

30 के दशक में उधम सिंह ने भारत छोड़ा और लंदन पहुंच गए। उधम सिंह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद 13 मार्च 1940 को आया। उस दिन लंदन के काक्सटन हॉल, लन्दन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी की मीटिंग थी। लगभग शाम 4.30 बजे उधम सिंह ने पिस्तौल से 5-6 गोलियां सर माइकल ओ द्व्येर के सीने में उतार दी और वहीँ उसकी मौत हो गयी। इस बदले की सबसे बड़ी बात यह थी की उधम सिंह को यह करने का कोई भी डर नहीं था। वे वहां से भागे नहीं थे, बस उनके मुख से यह बात निकली, मैंने अपने देश का कर्तव्य पूरा कर दिया।

शहीद उधम सिंह को अपनी मौत का कोई गम नहीं था बल्कि देश के लिए जान देने पर गर्व था। उनकी बस एक इच्छा थी की उनकी अस्थियों को उनके देश भेज दिया जाये पर यह नहीं किया गया। 1975 में भारत सरकार, पंजाब सरकार के साथ मिलकर उधम सिंह की अस्थियों को स्वदेश लाने में सफल हुई। गर्व सबको है उधम सिंह की शहादत पर लेकिन अफसोस भी है वह इसलिए क्योंकि उधम सिंह की शहादत सिर्फ किताबों में ही दर्ज है। इतिहास में उन्हें वो जगह नहीं मिल पाई जिसके वे असली हकदार थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *