“अभी सावन का मौसम है, मेघ नेह की बरसा कर रहे हैं, सावन में चारों तरफ हरियाली की चादर बिछ जाती है। सारा वातावरण खुशगवार हो जाता है। सावन महीना है, उस अनन्य बंधन को समझने का जिसे बारिश की बूंदे और भी गहरा बनाती हैं। बात गर बॉलीवुड की हो तो यहां भी सावन के मेघों को जरिया बनाया जाता है, प्रेम रस में भींगे दो दिलों की मनोदशा को समझने का। और जब पपीहे की कूक कानों में आती है तब दिल गुनगुनाने लगता है।”
“कस्तो मज्जा है लेलैमा, रामैलो ओ काली ओधाली”
लाइनें सीधी हैं, बस शब्द बदल जाते हैं अक्सर। बस यहां भी वही है, भाषा या कहें शब्द बदल गया है, परंतु भाव अछूता है, जिस भाव को हम किसी ना किसी रूप में, कभी ना कभी महसूस चुके हैं या रहे हैं। यहां भी उसी मनोदशा का जिक्र है, “कष्ट में ही मज़ा है और ऐसा मज़ा सिर्फ मोहब्बत में ही मुमकिन है और हो भी क्यूं नहीं, क्योंकि मोहब्बत में जीने-मरने का अंतर जो सिमट जाता है।” साल 2005 की फिल्म “परिणीता” में ना जाने कितने अरसे से कष्ट को मज़ा समझकर नायक जब “उम्मीद की ट्रेन” पर सवार होता है तो मिलन का वो आने वाला पल उसके लिए ईंधन का काम करता है। इस ईंधन की गरमी आपको ट्रेन के इंजन में दिखाई नहीं देगी, ना ही ट्रेन की रफ्तार में। हां, इस गरमी को आप महसूस कर सकते हैं नायक के होठों से गाने की शक्ल में निकलते शब्दों में। ट्रेन के डिब्बे के दरवाज़े पर आधे ज़िस्म को हवा के दामन में सौंपता नायक, जब खुद को हरी-भरी वादियों में जीने लगता है तब गाने के बोल उसके मोहब्बत की परिभाषा गढ़ते हुए एक-एक कर बाहर आने लगते हैं।
बस, “ये हवाएं, गुनगुनाएं, पूछे तू हैं कहां, तू है फूलों में कलियों में, या मेरे ख्वाबों की गलियों में”, गाने को उसी आगोश को जरिया बनाता नायक आगे बढ़ता जाता है। यकीन को भी यकीन ना आए, मोहब्बत में डूबे एक किरदार की कलाकारी पर। वो तो एक नादान अनुसरण कर रहा है कि मोहब्बत उसे जो सीखा रही, उसको सीखते जाना है, बिना किसी सवाल और संकोच के, बिना किसी शंका के। बांगला साहित्य के मूर्धन्य कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने तो अपनी “परिणीता” को शब्दों में ज़िंदगी बख़्श दीI अब, बारी नायक की है, जो तमाम “सोफिस्टिकेशन और स्टीरियोटाइप्ड फिलॉसफिकल टर्म” को दरकिनार करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है, ट्रेन की रफ्तार से भी तेज़, जिसकी स्पीड को स्पीडोमीटर भी नहीं समझ सकती है। तो, इस आला दरजे की पेशकश का सारा दारोमदार जाता है, निर्देशक प्रदीप सरकार को।
सपाट शब्दों और साधारण संगीत की चाशनी में भी ये गाना प्रभावी इसलिए है कि इसे “मोहब्बत की ईंधन” से पकाया गया है। वही, ईंधन जो नायक के दिल में जलता रहता है जब वो ट्रेन पर सवार रहता है। और उसी की गरमी के कारण वो अपनी “प्रेयसी का अक्स” फूलों से लेकर कलियों और ख्वाबों की गलियों में ढूंढता रहता है। और, कल्पना ऐसी की वो धरती से लेकर अंबर तक को मिलन की उम्मीद में सजा लेता है, साथ ही “मोहब्बत के सफर” में उससे हमसफर बनने की इल्तिज़ा करने की जुर्रत करता चला जाता है। ये दिखता साधारण है, लेकिन अहसास असाधारण होता है मोहब्बत का। और उधर प्रेयसी भी तो है जो उसकी कल्पना में गुनगुनाती है कि खुशी मिले या ग़म, तुम्हारे सफर की हमसफर बनना मेरा सौभाग्य है। वो, ख्वाबों की राहों पर मोहब्बत में मिलने वाली खुशियों के कारवां में शामिल होने को बेचैन है, और सारा कुछ नायक की कल्पना में हो या हकीकत में, “मोहब्बत को हुनर मालूम है दिल में और दिल से उतरने का।”
अगर आपको भी इस सावन की बारिश में “मोहब्बत का हुनर” सीखना है तो सवार हो जाईए, “उम्मीदों की ट्रेन” पर। ये ट्रेन आपको ले जाएगी उस मंजिल की तरफ जहां जाने के लिए पटरी की जरूरत नहीं होती है। बस आप ट्रेन पर सवार हो जाएं आप। लेकिन, सावधानी इतनी की स्टेशन का इंतज़ार मत करना, क्योंकि कुछ सफर थमते नहीं हैं, मोहब्बत की तरह। हालांकि, इस सफर में अपने होठों पर “गुनगुनाने की गुंज़ाइश” जरूर रखना। तो, ट्रेन आपका इंतज़ार कर रही है, आप भी इस पर सवार हो जाईए, और गुनगुनाना शुरू कर दीजिए।
“कस्तो मज्जा है लेलैमा, रामैलो ओ काली ओधाली।”
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)





