ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया न्यूज़: सतलुज यमुना लिंक (SYL) नहर मामले की सुनवाई गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 6 हफ्ते का वक्त मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलील मानते हुए 6 हफ्ते का वक्त दे दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 8 नवंबर1 को होगी।
पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद नवंबर 1966 में पंजाब के राज्य बनने के साथ ही शुरू हो गया था। केंद्र सरकार ने पंजाब री-ऑर्गेनाइजेशन एक्ट में सेक्शन 78-80 जोड़ दिए थे। इसके तहत पंजाब में नदियों के पानी और हाइडल पॉवर पर केंद्र का नियंत्रण हो गया था।
अप्रैल 1976 में केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसके तहत पंजाब की नदियों के कुल 15.85 मिलियन एकड़ फुट पानी में से पंजाब व हरियाणा को 3.5-3.5 एमएएफ अलॉट कर दिया गया। बाकी पानी राजस्थान, दिल्ली और जेएंडके को दिया गया। पंजाब सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई।
दिसंबर 1981 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। केंद्र और तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। बैठक में एकत्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसमें नए सिरे से बंटवारा तय हुआ।
इस बार पानी 15.85 एमएएफ से बढ़कर 17.17 एमएएफ हो गया था। इसमें पंजाब को अपने हिस्से 4.22 एमएएफ के अलावा 1.32 एमएएफ और मिला। हरियाणा का हिस्सा 3.5 एमएएफ ही रहा। इसके बाद पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट से केस वापस ले लिया।
अप्रैल 1982 में इंदिरा गांधी ने पटियाला के गांव कपूरी में एसवाईएल निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। तभी अकाली दल ने इसके खिलाफ धर्म युद्ध मोर्चा शुरू कर दिया। यह आंदोलन हिंसक होता गया और पंजाब को कई सालों तक आतंकवाद झेलना पड़ा।
जुलाई 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और शिअद प्रधान हरचंद सिंह लौंगोवाल के बीच समझौता हुआ, जिसमें नदियों के पानी के बंटवारे पर ट्रिब्यूनल गठित करने का फैसला किया गया। ईराडी ट्रिब्यूनल बना, पर उसकी सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं।
मुख्यमंत्री एसएस बरनाला की सरकार में एसवाईएल का निर्माण शुरू हुआ था। 90 फीसदी निर्माण के बाद 1992 में आतंकियों ने दो इंजीनियरों और कई मजदूरों को मार दिया, फिर निर्माण बंद हो गया। उधर, हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर का निर्माण जून 1980 में ही कर लिया था
एसवाईएल के निर्माण के लिए 1999 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हरियाणा
1999 में हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर कर एसवाईएल के निर्माण की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दोनों राज्यों के बीच विवाद निपटाने को कहा। 2002 और 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पंजाब में एसवाईएल का निर्माण पूरा करने के आदेश दिया।
हालांकि, पंजाब ने दलील दी कि बंटवारा जिस समय हुआ था, तब 17.17 एमएएफ पानी था, जो अब घटकर 14.37 एमएएफ रह गया है। इसलिए ट्रिब्यूनल गठित कर पंजाब में पानी की उपलब्धता का आकलन किया जाए। इसके अलावा पंजाब की दलील रही है कि राजस्थान और हरियाणा उसके राइपेरियन स्टेट ही नहीं है, इसलिए उनका पंजाब के पानी पर कोई हक नहीं है।
कैप्टन ने रद्द कर दिया था त्रिपक्षीय समझौता
जुलाई 2004 तत्कालीन सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सभी पार्टियों को साथ लेकर टर्मिनेशन ऑफ रिवर्स वाटर एक्ट पास किया। इससे पानी से संबंधित पुराने सारे समझौते रद्द कर दिए गए, जिनमें 1981 का त्रिपक्षीय समझौता भी शामिल था। केंद्र सरकार ने इस एक्ट की वैधता पर प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा। साल 2004 से 2009 तक उस पर सुनवाई चलती रही, पर कुछ नहीं हुआ।
पंजाब और हरियाणा के बीच SYL विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों राज्य इस मुद्दे शांति बनाए रखें ! जब तक कोर्ट में सुनवाई चल रही है पंजाब और हरियाणा सरकार से सुनिश्चित करें कि SYL को लेकर कोई धरना प्रदर्शन ना हो ! सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SYL पर कोर्ट का फैसला लागू होना चाहिए ! कोर्ट ने पंजाब को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर हरियाणा ने अपने इलाके में नहर बनाने का काम पूरा कर लिया है तो पंजाब ने क्यों नहीं किया ! अगर नहर के लिए पानी की समस्या है तो बाद में देखेंगे ! पंजाब पहले नहर का निर्माण करे फिर पानी के बारे में तय करेंगे ! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दो महीने का वक्त दिया ताकि वह दोनों राज्यों के बीच सुलह की कोशिश कर सकें ! कोर्ट ने कहा कि वक्त का मतलब यह नहीं है कि पंजाब सरकार इसे लंबा खींचे ! अगली सुनवाई सात सितंबर को होगी !
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