सावधान रहें, खतरे में हैं आपके बच्चे!

न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : जिस स्कूल के भरोसे आप अपने बच्चे को पढ़ने भेजते हैं, क्या वहां बच्चे सुरक्षित हैं। यह सवाल गुरूग्राम के रेयान…

न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : जिस स्कूल के भरोसे आप अपने बच्चे को पढ़ने भेजते हैं, क्या वहां बच्चे सुरक्षित हैं। यह सवाल गुरूग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के छात्र प्रद्युमन की हत्या के बाद उठा है। शुक्रवार को प्रद्युमन की गला रेतकर हत्या कर दी गई, उसका शव बाथरूम से मिला। इस घटना के सामने आने के बाद स्कूल मैनेजमेंट सवालों के घेरे में आ गया है। बताया जाता है कि स्कूल पहुंचने के महज 15 मिनट बाद ही छात्र का शव बाथरूम से मिला। जिसके बाद हरियाणा से लेकर दिल्ली तक इस हत्याकांड की गूंज सुनाई देनी लगी।

दरअसल कुकरमुत्ते की तरह फैलते जा रहे अधिकांश निजी स्कूलों के बच्चे असुरक्षित हैं। अगस्त में भी गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित जीडी गोयनका स्कूल में अरमान सहगल नाम के छात्र की मौत हो गई थी। साल 2016 में दिल्ली के वसंतकुंज स्थित रेयान इंटरनेशनल के एक छात्र देवांश की मौत हुई थी। देवांश की मौत के बाद कहा गया था कि उसके साथ दुष्कर्म किया गया था। सबसे हैरानी की बात यह थी कि देवांश का शव पानी की टंकी में मिला था, आखिर वो वहां कैसे पहुंचा यह आज तक रहस्य बना हुआ है।

देश की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी बच्चे!

आप यकीन नहीं करेंगे, लेकिन यह सौ फीसद सत्य है कि 1974 में बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई। इसके तहत बच्चों को देश की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी कहा गया। दूसरी तरफ सरकार का सर्वे बताता है कि 70 फीसदी बच्चों को शारीरिक छेड़छाड़ का सामना करना पड़ा। जिसमें 50 फीसदी का यौन शोषण किया गया था। हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने स्कूलों के लिए जरूरी गाइडलाइन जारी किया था, कोशिश थी कि बच्चों को स्कूल में सुरक्षा दिया जाए। बावजूद अधिकांश स्कूल में सुरक्षा भगवान भरोसे है।

अगर बात रेयान इंटरनेशनल की जाए तो देश के 18 राज्यों में इसके तीन सौ से ज्यादा स्कूल हैं। इसके पहले भी रेयान इंटरनेशनल में बच्चे की मौत हो चुकी है। बावजूद स्कूल में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। सबसे बड़ी बात यह है कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरा लगाया गया है। सुरक्षा के लिए चौबीस घंटे गार्ड तैनात रहते हैं। बावजूद प्रद्युमन की हत्या हो जाती है तो देवांश का शव पानी की टंकी में पहुंच जाता है। मतलब साफ है कि स्कूल बच्चों को सुरक्षा देने में पूरी तरह फेल हो चुका है।

शारीरिक शोषण के शिकार बच्चे

बच्चों को किसी भी देश का भविष्य कहा जाता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि देश के दो में से एक बच्चे शारीरिक शोषण के शिकार होते हैं। इसका खुलासा मई में जारी वर्ल्ड विशन इंडिया के सर्वे से हुआ है। सर्वे में देश के 26 राज्यों के 12 से 18 साल के बच्चों को शामिल किया गया था। खौफनाक सच का पता इससे चलता है कि 12 या इससे कम उम्र के बच्चे छेड़छाड़ के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। दूसरी तरफ यूनीसेफ की मानें तो भारत के 5 से 11 साल के बच्चों के साथ छेड़छाड़ की सर्वाधिक घटनाएं सामने आती हैं।

अब आपको एक और सच बताते हैं, यह उस सरकार को भी जानना जरूरी है जिसने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद किया है। इस देश की 48 फीसदी बच्चियां चाहती हैं कि वो लड़के होते। सर्वे में यह भी सामने आया है कि करीब 54 फीसद बच्चे भी लड़कियों की तरह खतरे में रहते हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि बच्चों से जुड़े अधिकांश आपराधिक मामलों में रिश्तेदार, माता-पिता, जाना-पहचान वाले, शिक्षक और दोस्त ही शामिल होते हैं। मतलब साफ है कि तमाम कोशिशों के बावजूद देश का भविष्य सुरक्षित नहीं हैं।

उत्तरप्रदेश के बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित

अब आपको बताते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों में क्या है बच्चों की स्थिति। ब्यूरो के आंकड़े से साफ है कि साल 2014 में 89,423 बच्चों के साथ अपराध किया गया था, यह वो आंकड़ा है जो दर्ज कराया गया है। कई मामले ना तो पुलिस के पास पहुंचते हैं और ना ही कहीं और। दूसरी तरफ साल 2016 में 1,05,785 बच्चे आपराधिक वारदातों के शिकार बने। आंकड़ों की मानें तो उत्तरप्रदेश के बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं, इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है।

साल 2014 और 2016 में बच्चों के साथ दुष्कर्म के हैरान करने वाले आंकडें सामने आए हैं। 2014 में पॉस्को (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत 8,904 जबकि 2016 में 35,980 बच्चे अपराध के शिकार बने थे। शर्मनाक हकीकत यह है कि पॉस्को एक्ट के मामलों के निष्पादन की गति काफी धीमी है। बताया जाता है कि पॉस्को एक्ट के तहत दर्ज मामलों के निपटारे में करीब 12 साल ज्यादा लग सकते हैं। महाराष्ट्र में यही साल बढ़कर 20 तो गुजरात में 40 साल हो जाएगा।

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