महाराष्ट्र बनता जा रहा ‘अन्नदाताओं का राज्य’ पंजाब!

न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : पंजाब के लोकप्रिय कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है, ‘हमारे लहू को आदत है’। वैसे तो पाश ने कविता…

न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : पंजाब के लोकप्रिय कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है, ‘हमारे लहू को आदत है’। वैसे तो पाश ने कविता के माध्यम से सामंतवादी सोच को चुनौती दी, लेकिन उनकी कविताएं हकीकत के भी उतनी ही पास है जितनी खुद पाश की सोच रही। पाश कभी अल्हड़ नहीं हुए, शब्दों को लड़खड़ाने नहीं दिया। और आज जब पंजाब के किसान मर रहे हैं तो पाश की बहुत याद आ रही है। पहले पढ़िए पाश ने लिखा क्या है अपनी कविता में।

हमारे लहू को आदत है, मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता

जिंदगी के जश्न शुरू कर लेता है, सूली के गीत छेड़ लेता है

शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं, लहू है की तब भी गाता है

ज़रा सोचें की रूठी सर्द रातों को कौन मनाए?

निर्मोही पलों को हथेलियों पर कौन खिलाए?

लहू ही है जो रोज धाराओं के होंठ चूमता है, लहू तारीख की दीवारों को उलांघ आता है

यह जश्न यह गीत किसी को बहुत हैं, जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में

तैरने का अभ्यास करते थे।

अब वापस मुद्दे पर आते हैं, जिसने कर्ज से दरकते जा रहे किसानों के माथे पर बेरहम राजनीति का वो तिलक कर दिया है, जिसका दाग हर गुजरते दिन के साथ गहरी और भी गहरी धंसती जा रही है। आखिर किसान मरता क्यों है। सरकार बदलती जाती है, फिर भी किसानों की मौत का सिलसिला थमता क्यों नहीं? आखिर किसानों की जिंदगी पर किसकी नजर लग गई है? क्या किसान आज सचमुच मौत चाहता है या कुछ और?

फिरोजपुर और बठिंडा में किसान ने की खुदकुशी

पंजाब के फिरोजपुर में कर्ज से परेशान किसान ने खुदकुशी कर ली। 27 साल के गुरसेवक सिंह ने करीब पांच एकड़ की जमीन सब्जी उगाने के लिए ठेके पर ले रखी थी। बैंक और आढ़तियों से लिया गया सात लाख का कर्ज भी उसके सिर पर था। उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो सारा कर्ज चुका देगा, अपने भाई की बेटी की शादी करा देगा। लेकिन ऐसा हो ना सका और गुरसेवक ने जीने की उम्मीद छोड़ दी। 27 अगस्त को वो राजस्थान फीडर नहर में छलांग लगाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। उसका शव बरामद कर लिया गया है। गुरसेवक अपने पीछे बूढ़ी माता, पिता, बच्चे और उस भतीजी को छोड़ गया है जिसकी शादी वो कराना चाह रहा था। गुरसेवक के घर में मातम छाया हुआ है परिवार के आंसू थम नहीं रहे हैं और बेशर्म राजनीति को शर्म नहीं आ रही है। दूसरी तरफ बुधवार को बठिंडा में कर्ज से परेशान घुम्मन कलां के किसान गुरनाम सिंह ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। गुरनाम सिंह के सिर पर करीब दस लाख रूपये का कर्ज था। कर्ज चुकाने की कोई उम्मीद नजर नहीं आई तो उसने आखिर में मौत को गले लगा लिया।

दम तोड़ता जा रहा पंजाब का अन्नदाता

कैप्टन सरकार जब सत्ता में आई थी तो उसने वादा किया था कि कर्जा और कुर्की से मुक्ति दिलाई जाएगी। सरकार को पांच महीने से ज्यादा हो गए हैं और 160 से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं। दरअसल मौजूदा हालात ऐसे हैं कि हर दिन दो किसान कर्ज की वजह से खुदकुशी करने को विवश हैं। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि पिछले कुछ महीनों में किसानों की खुदकुशी में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट की माने तो कर्ज ने पंजाब के किसानों को बदहाल कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 से 2010 के बीच किसानों की खुदकुशियों के मामले काफी बढ़े हैं। इस दौरान करीब सात हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की। 6 हजार किसान मालवा इलाके के छह जिलों के हैं। जिन छह जिलों में किसानों की खुदकुशी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसमें लुधियाना, मोगा, बरनाला, मानसा, संगरूर और बठिंडा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मानसा, बरनाला और बठिंडा को किसान खुदकुशी का केंद्र कहा जाता है।

आखिर क्यों खुदकुशी कर रहे हैं किसान?

किसानों की खुदकुशी का सिलसिला नया नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादा खुदकुशी कर्ज से परेशान होने के कारण की जाती है। पिछले पांच महीनों के आंकड़ों पर गौर करें तो आपको पता चलेगा कि पंजाब के खुदकुशी करने वाले 99 फीसदी किसानों ने कर्ज के चलते मौत को गले लगाया। दरअसल किसान कर्ज तो ले लेते हैं, लेकिन वो चुकाने में सफल नहीं हो पाते हैं। सरकार जो भी वादा करती है उसे पूरा नहीं करती। इसका उदाहरण देखिए कि सूबे की कैप्टन सरकार केंद्र से करीब 10 हजार करोड़ रूपये मांगती है ताकि किसानों का कर्ज माफ किया जा सके। और खुद बजट में 1500 करोड़ का प्रावधान करती है, मतलब सरकार गंभीर नहीं है। अगर गंभीर होती तो बयानों और दावों की जगह धरातल पर कुछ ठोस कार्रवाई की जाती। शर्मनाक हालत यह है कि सूबे के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह हों या वित्त मंत्री मनप्रीत बादल वो किसानों से खुदकुशी नहीं करने की अपील करते बस दिख जाते हैं। सवाल शेष रह जाता है कि आखिर अन्नदाताओं की सुध क्यों नहीं ली जा रही। या शायद राजनीति अभी किसानों की खुदकुशी को सिर्फ नफा-नुकसान के चश्मे से ही देख रही है।

महाराष्ट्र ना बन जाए अन्नदाताओं का राज्य पंजाब

किसानों की खुदकुशी के मामले में सबसे ऊपर महाराष्ट्र है। इसके बाद पंजाब और तेलंगाना का नंबर आता है। सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2015 में करीब तीन हजार किसानों ने खुदकुशी की थी। इसमें 1800 से ज्यादा किसान सिर्फ महाराष्ट्र के थे। वहीं पंजाब में किसान खुदकुशी के पिछले पांच महीने के सरकारी आंकड़े 160 से ऊपर चले गए हैं। हैरानी की बात यह रही कि 15 अगस्त को कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने भाषण में किसानों की मदद का आश्वासन दे रहे थे तो दूसरी तरफ चार किसानों ने खुदकुशी कर ली। मतलब साफ है कि किसानों को बेवफा सरकार पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया है। दरअसल ये अन्नदाताओं का दर्द है, जिसे आज तक दवा नहीं मिल सकी है। नई सरकार में तो उम्मीद बंधी थी कि सबकुछ शुभ-शुभ होगा, लेकिन किसानों की किस्मत गच्चा दे गई। हर दिन खुदकुशी के आंकड़ें बढ़ते जा रहे हैं, खेतों का सीना चीरकर अन्न उपजाने वाले किसान मरते जा रहे हैं, हरजाई राजनीति बयानों में सिमट कर रह गई है और पंजाब की उपजाऊ धरती बंजर होने के कगार पर पहुंच चुकी है।

उपजाऊ वाली जमीन में पंजाब के किसान बदहाल

पंजाब, पंज और आब, के मेल से बना हुआ है। इसका मतलब है, पांच और पानी। इसका शाब्दिक अर्थ होता है पांच नदियों का क्षेत्र। ये पांच नदियां हैं – सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम। आपको हम ये इसलिए बता रहे हैं कि पंजाब पर प्रकृति की विशेष कृपा रही है। इस कारण ही पंजाब की जमीन हमेशा से उपजाऊ रही है। फिर चाहे सिंधु घाटी सभ्यता हो बाद का कालखंड, कहीं ना कहीं मानव सभ्यता के शुरूआती चरण पंजाब से जुड़े ही रहे। समय गुजरने के साथ ही किसान बदहाल होते चले गए और उस पर जमकर राजनीति ही की गई। अवतार सिंह पाश भले ही 1988 में दुनिया से विदा हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी कविताओं से ही यह बता दिया था कि पंजाब के आने वाले दिन घातक होंगे। किसानों की मौत और उस पर जारी जहरीली राजनीति बस इसी का उदाहरण भर है। दरअसल पाश ने इस किसानों की मौत की राजनीति पर भी लिखा था। लेकिन अपनी कविता में उम्मीद भी बंधा गए थे कि कुछ ना कुछ बेहतर जरूर होगा।

”मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर, बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर, मुझे क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊंगा, बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो, धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी, दो साल दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी, यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना, जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा।”

बेशक आपको लगे कि किसानों की खुदकुशी महज आंकड़ों का खेल और बेशर्म राजनीति का नमूना है। लेकिन अगली बार आप किसी किसान की मौत का खबर पढ़ें तो खेतों में चले जाएं। अपनी मुट्ठी में खेत की मिट्टी को उठाकर खुद से एक सवाल जरूर करें कि आखिर पंजाब के किसान क्यों मर रहे हैं। और ये सवाल भी उनसे पूछें जिनके हाथों में आपने सत्ता की लगाम सौंपी है कि आखिर चूक कहां हुई है।

 

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