महाकवि कालिदास ने ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे….’ लिख कर उसे अमर कर दिया है। इसीलिए लोक मन पहले आषाढ़ से ही झमाझम बारिश की आस करने लगता है। कुछ ऐसी बारिश जिसमें मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ की नायिका मल्लिका भीगी थी। ‘आषाढ़ का पहला दिन और ऐसी वर्षा, माँ !…ऐसी धारासार वर्षा ! दूर-दूर तक की उपत्यकाएँ भीग गईं।…और मैं भी तो।’
फिर आषाढ़ की पूर्णिमा आते-आते वर्षा तो धारासार होनी ही थी। गुरु पूर्णिमा पर ये वर्षा आशीर्वाद की होती है। जमकर बरसते हैं मेघ। आशीर्वाद। गुरु कृष्ण हैं और शिष्य राधा। विचित्र है। इस युग में! मेघ में कृष्ण तो दिखते ही हैं। लेकिन गुरु? मेघ गुरु है। कभी सफेद तो कभी काले। कभी गंभीर तो कभी विनोदपूर्ण। शीतल। स्नेह। शिष्य की तपन मिटाने चले आते हैं। शिष्य व्याकुल है। सीखने को आतुर। गुरु प्यास मिटाते हैं। ठोकते भी हैं। कुम्हार के घड़े की तरह।
‘गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है,
घड़ी-घड़ी काढ़े खोट,
भीतर हाथ सहार दे,
बाहर मारै चोट।’
लेकिन अब कहां चोट है? सिर्फ स्नेह है। सहारा है। जैसे गोपियां हर जगह अपने परमप्रभु कृष्ण को देखती हैं, वैसे ही शिष्य भी हर जगह गुरु का ही संदेश देखता है। कल्पना करता है। गुरु कैसे करते? कैसे राह दिखाते? और चल पड़ता है उस राह पर, जिसे उसने गुरु का दिखाया हुआ मान लिया है। गुरु भीतर भी हैं। परमात्मा की तरह। (मंदिर में ना, मस्जिद में/ ना काबे कैलास में/ मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।)
अपने तो देव भी चार महीनों के लिए सो जाते हैं। लेकिन गुरु? क्या कभी सोते हैं? क्या शिष्य की चिंता सोने देती है? देव तो चतुर्मास के बाद उठ जाते हैं, लेकिन गुरु सोते ही कब हैं? चिंता। तभी तो देवों से बढ़कर हैं गुरु। माता-पिता से बढ़कर हैं गुरु। माता-पिता जन्म देते हैं। लेकिन आपको ‘बनाते’ हैं गुरु। आपके व्यक्तित्व का निर्माण। सृजन को सुंदर बनाते हैं गुरु।
सावन आने को है। सखियों का महीना। आनंद और उल्लास का माह। झूला। हरियाली। संदेश। गुरु सखा हो जाते हैं। इतना विराट व्यक्तित्व और ये मिलनसारिता! ओह। दुर्लभ है। सखा से बढ़कर। सखा! यानी कृष्ण। फिर आते हैं कृष्ण। मेघ में दिखते कृष्ण। सुदामा की लाठी में दिखते कृष्ण। गुरु को कृष्ण प्रिय हैं। मुझे गुरु। क्योंकि मेघ में दिखते हैं गुरु। गर्मी से राहत दिलाते। स्नेह बरसाते। खेतों/दफ्तर में उम्मीद पैदा करते।
मेघ शाश्वत हैं। गुरु भी। बचपन से याद करें। पेंसिल पकड़ना किसने सिखाया? पहला अक्षर? पहला वाक्य? पहली बड़ी परीक्षा? नौकरी वाली परीक्षा? और सबसे बढ़कर जीवन की परीक्षा? पास करने का रास्ता किसने बताया?
गुरु ने। गुरु वहीं हैं, आप भागते रहे। अनजाने लक्ष्य के पीछे। और गुरु? मेघ की तरह। बरस गये। सबकुछ दे दिया। मानव मात्र की भलाई के लिए।
गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरा:
गुरुर साक्षात् परं ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नम:
– राजन अग्रवाल, संपादक, लिविंग इंडिया न्यूजl
