जिन हाथों में देश का भविष्य है, वो किताबों की दुनिया से दूर हो तो आप क्या करेंगे। वो छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिनके लिए शायद पेट की आग शिक्षा की रोशनी से ज्यादा अहमियत रखती है। यही कारण है कि कैथल में बड़ी संख्या में बच्चे सड़कों पर भीख मांगते और मजदूरी करते मिल जाएंगे। सरकार की कई योजनाओं के बावजूद ये नजारा आसानी से दिख जाएगा, जिससे साफ है कि अब भी जारी है बाल मजदूरी का अंतहीन सिलसिला।
छोटे-छोटे बच्चों के लिए सबसे जरूरी होती है पढ़ाई। इसके लिए शिक्षा के अधिकार का अधिनियम लागू किया गया। लेकिन नीति के क्रियान्वयन में शायद चूक हो गई, लिहाजा बच्चे स्कूल ना पहुंचकर आ गए सड़कों पर। और सड़कों पर जिंदगी की जद्दोजहद में वो ना सिर्फ अपना बचपन खोते जा रहे हैं, बल्कि देश का भविष्य भी अंधकार में चला जा रहा है। बाल मजदूरी की बात की जाए तो आज कैथल में कई जगह छोटे-छोटे बच्चे भीख मांगते मिल जाएंगे। इसके अलावा भी कई बच्चे फुटपाथी दुकानों पर अपना बचपन बर्त्तन से घीसते मिलेंगे। ये हकीकत है ऑपरेशन मुस्कान की। जिसे चलाया तो गया बाल मजदूरी खत्म करने के लिए, लेकिन यह सपना पूरा नहीं हो सका।
हैरानी की बात यह है कि सरकार ने सभी को शिक्षित बनाने के लिए शिक्षा के अधिकार का अधिनियम को लागू किया है, ताकि बच्चों को निशुल्क प्राथमिक शिक्षा मिल सके। इसके बावजूद बाल मजदूरी जारी है। बच्चे या तो दुकानों या ठेले पर सामान बेचने का काम कर रहे हैं। कई तो होटलों में काम करने को विवश हैं, क्योंकि इनके माता-पिता के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो बच्चों को पढ़ाई में मदद कर सकें। लिहाजा बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने को विवश हैं।
ऐसा नहीं है कि प्रशासन को इस हकीकत का पता नहीं है, बाल कल्याण समिति के सदस्य का कहना है कि बाल मजदूरी के लिए प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाती है। बाल कल्याण समिति का प्रयास है कि बाल मजदूरी को पूरी तरह समाप्त किया जाए। कैथल में बाल मजदूरी समाप्त करने के पर्याप्त प्रयास किए गए हैं। सरकार ऑपरेशन मुस्कान भी चला रही है। अगर किसी को बच्चों से मजदूरी करवाते पकड़ा गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं समाजसेवियों का कहना है कि प्रयास किया जा रहा है कि बच्चों को मजदूरी की जगह स्कूल पहुंचाया जाए। अगर किसी बच्चे को माता-पिता बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा पाते हैं तो बाल विकास समिति उनका पालन-पोषण करेगी और अन्य व्यवस्था के लिए सहायता देने को तत्पर है।
भले ही सरकार या प्रशासन लाख दावे कर ले, लेकिन सड़कों पर मजदूरी करते और भीख मांगते दिखने वाले बच्चे उन दावों पर सवालिया निशान जरूर लगाते हैं। ये हकीकत है बच्चों की बेहतरी के लिए चलाए जा रहे अभियानों की, जिसके लिए लाखों रूपये खर्च कर दिया गया, लेकिन जिनको जरूरत थी, उन्हें मदद नहीं मिली।





