Punjab, the land of ‘Veer-Zaara’, has love at the core of its social fabric

‘मोहब्बत का हुनर’ सिखाने वाला, ऐसा ‘देस’ है मेरा… किसी ‘देस’ को कितना समझते हैं आप?  इस सवाल का जवाब खोजना इतना आसान है क्या? …

‘मोहब्बत का हुनर’ सिखाने वाला, ऐसा ‘देस’ है मेरा…

किसी ‘देस’ को कितना समझते हैं आप? 

इस सवाल का जवाब खोजना इतना आसान है क्या? 

अच्छा, आप ये बता सकते हैं कि, कोई ऐसा ‘देस’ हो सकता है जहां मौसम महीनों की बंदिशों से नहीं बंधा हो? 

क्या किसी ‘देस’ के कण-कण में प्रेम मिल सकता है? 

Chandigarh : आखिर मैं ‘देस’ का जिक्र क्यों कर रहा हूं, इसका कारण यह है कि पांच दरियाओं के बीच जो हंसता प्रदेश है ना वो असल में एक ‘देस’ ही है। कारण की पिया जब दूर रोटी कमाते हैं तो पपीहे की हर कूक में एक सूनापन झलकता है। और वो सूनापन तभी अमल में आता है जब पिया ‘देस’ से दूर ‘परदेश’ में हों। यह सूनापन का अहसास जब दूरी की पत्थर पर घिसा जाता है तब जुदाई की बेला इतनी पैनी हो जाती है कि दिल चीरकर रखने का हुनर उसमें आ जाता है।

Wheat field in a land (File Photo).
Wheat field (File Photo).

इसी जुदाई को थीम बनाकर जब मोहब्बत (love) की आंच पर राजनीतिक और सैनिक बंदिशों की चासनी में ‘विशुद्ध प्रेम’ (true love) को पकाया जाता है तो एक दर्द भरी लव स्टोरी बनती है। और, उस स्टोरी का नायक 22 सालों तक अपने ‘देस’ से दूर सरहद पार के एक जेल की कालकोठरी में तड़पता रहता है, तो नायिका तिल-तिल कर मरती रहती है, उसके मिलन के इंतजार में।

जानते हैं वो नायक है, वीर प्रताप सिंह और वो नायिका है ज़ारा हयात खान। जिनके मोहब्बत की तासीर को किसी मुल्क की सरहदें और धर्म के ठेकेदार रोक नहीं पाते हैं। साल 2004 में आई और मशहूर निर्देशक यश राज चोपड़ा की देखरेख में पली-बढ़ी इस फिल्म का नाम है ‘वीर ज़ारा’, जिसमें मौशिकी के जरिए ‘वीर और ज़ारा’ के उस दर्द को महसूसने की कलाकारी है, जो अपने आप में आला है। और इसी फिल्म के एक गाने ‘धरती सुनहरी अंबर नीला, हर मौसम रंगीला’ में मोहब्बत को आधार बनाकर ‘देस’ का शानदार बखान किया गया है।

वीर जब पहली-पहली बार ज़ारा को लेकर अपने ‘देस’ आता है तो उस ‘देस’ की मिट्टी से सरगम की धुन निकलती है। जिसकी मिट्टी पर लहलहाते फसल और अपार विस्तार लिए फलक से संगीत का आठवां शब्द ‘मोहब्बत’ का बनता है। ज़ारा का हाथ थामे जब वीर कहता है कि अंबर के नीचे उसके ‘देस’ की जो धरती है, उस पर हर रूत बसती है। ऐसा शानदार ‘देस’ और कहीं नहीं है। वीर कहता जाता है कि पके फसलों से सोने जैसे सुनहरी इस ‘देस’ के ऊपर नीला आसमान है, जहां का हर मौसम रंगीला है। इस ‘देस’ में बस पपीहा और कोयल बोल दें तो सावन की रूत आ जाती है।

A still from the movie “Veer Zaara” (File photo).

बकौल वीर उसके ‘देस’ में जब गेहूं की फसल से होकर हवा गुजरती है तो लगता है कोई माशूका अपने आशिक से मिलने के लिए ज़ुल्फों को संवार रही है। अलहदा ये बखान कि, तालाब में पानी भरने के दौरान जब लड़कियों के घड़ों में पानी जाता है तो बांसुरी की मीठी धुन सुनाई पड़ती है। वीर के ‘देस’ के हर कदम पर मोहब्बत की एक कहानी भी है जो पिछली कहानी से आगे बढ़ती जाती है। यही मोहब्बत की कहानी भी तो ‘वीर और ज़ारा’ की है।

और, वीर ये भी बताता है कि उसके ‘देस’ में अभी भी सदियों से चली आ रही परंपरा जीवित है। अभी भी यहां मेले लगते हैं, जिसमें परिवार की सही परिभाषा देखने को मिलती है। मेले में सबकुछ है जो ‘देस’ में ही मिल सकता है, किसी शहर या मुल्क में नहीं। ये गाना ‘देस’ की व्याख्या के साथ आगे बढ़ता जाता है और वीर की जुबान से निकले हर शब्द को ज़ारा अपने कानों के जरिए दिल के किसी कोने में सफ़ दर सफ़ संजोती जाती है।

A still from the movie “Veer Zaara” (File Photo).

ज़ारा तो अब वीर को अपने मन में बसाने की जुगत करने लगती है कि तभी झूला झूलती लड़कियां एक सवाल करती हैं, विशुद्ध पारंपरिक गीत से। सवाल है कि ‘ये जो मोहब्बत का रास्ता है ना, वो बड़ा कठिन है जिस पर मर्यादाओं के अनगिनत कांटे हैं। अच्छा, ज़ारा ये बताओ, जब ये कांटें तुम्हें चुभेंगे तो उसका दर्द तुम अपने होने वाले हमसफर से कैसे बांटोगी? कैसे तुम कांटों भरी इस सड़क पर अकेले रास्ता तय करोगी?’

इस सवाल का जवाब ज़ारा की खामोशी और वीर के शब्दों में है। वो कहता है कि उसके ‘देस’ में मेहमान तो भगवान हैं, लेकिन ज़ारा तो उसकी हयात (दुनिया) है। क्या बस एक सरहद की दूरी उनके माथे पर जुदाई का टीका लगा देगी? इस जवाब के साथ ही सारे संशय के बादल कहीं गुम हो जाते हैं और नीले आसमान में चमकता उम्मीदों का सूरज ‘देस’ की धरती को मोहब्बत की सुनहरी धूप से रंग देता है। इस चमकती धूप में ज़ारा का खिलखिलाता चेहरा बस इतना ही कहता है,

A still from the movie “Veer Zaara” (File Photo).

‘तेरे देस को मैंने देखा, तेरे देस को मैंने जाना 

जाने क्यूं ये लगता है, मुझको जाना पहचाना, 

यहां भी वही शाम है, वही सवेरा 

ऐसा ही देस है मेरा, जैसा देस है मेरा।’

बस, हर जगह से हारी और ठुकराई मोहब्बत इस ‘देस’ में आकर जीत जाती है, क्योंकि ये ‘देस’ बांहें फैलाये स्वागत करता है हर शख्स का, जिसे तलाश है सच्चे मोहब्बत की। और, जानते हैं आप इस ‘देस’ का नाम क्या है? इस ‘देस’ का नाम है ‘पंजाब’। ‘पंजाब’ मतलब पांच दरियाओं ‘सतलुज, रावी, व्यास, चेनाब और झेलम’ से मिलकर बना ‘देस’। ‘देस’ इसलिए कि आज भी जुदाई के दर्द की फसल हरी है इसकी मिट्टी में। जुदाई घर से दूर, मिट्टी से दूर और मोहब्बत से दूर रहने की। और, जुदा हुए लोग शहरों में उसके लिए तड़प रहे हैं, जिसकी कसक ‘वीर-ज़ारा’ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *